बात 1990 से करते हैं .... बिहार के राजनैतिक पटल पर उथल-पुथल और ललुआ का अभ्युदय, ललुआ इसलिए कि समकालीन तथाकथित प्रबुद्ध लोगों की जुवान लालू प्रसाद यादव या फिर लालू यादव कहने में कंपकंपाती थी । तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग के बुजुर्ग हो या कल का बालक उनके जुवान से सिर्फ यही शब्द सुनने को मिलती थी "ललुआ"।
ललुआ ....दबे कुचलों की आवाज, ललुआ....गरीबों का मसीहा, ललुआ....तात्कालीन सामाजिक संरचना(असमानता) के विध्वंसक, ललुआ....छोटे तबके के लोगों के समकालीन हिरो। बिहार में एक वर्ग जो आज तक सामाजिक असमानता को जिंदा रखने में कामयाब रहे थे उनके लिए विलेन .... ललुआ। वक्त का पहिया घुमाता रहा , ललुआ का भी कद बढ़ता रहा ,साथ ही बढ़ता रहा पिछड़ों , अतिपिछड़ों और अनुसूचित जातियों का हिम्मत, प्रगतिशील सोच और वाक क्षमता। प्रबुद्धजनों ने समय-चक्र को पढ़ते हुए हालात से समझौता करना ही उचित समझा और उपरी तौर पर समसामयिक वातावरण में खुद को फिट कर लिया और उचित समय का इंतजार करने लगा।समय का पहिया चलता रहा , ललुआ का जादू बोलता रहा ,भगवतिया देवी सांसद बन गई,बमभोला यादव विधायक बन गए ,ऐसे कई उदाहरण हैं
..... परन्तु समय के इन्तजार में बैठे प्रबुद्ध लोगों ने अन्दर ही अन्दर अपना प्रबुद्धमय कार्ययोजना जारी रखा और निम्नवर्गीय अप्रबुद्धजनों पर धीरे-धीरे "सत्ता का ताप" चढ़ा ललुआ के लिए भस्मासुरों की जखीरा खड़ा कर डाला।अब ललुआ का जादू सर चढ़ कर बोलने लगा था , इसे नाम दिया गया जंगल राज। लालू प्रसाद यादव द्वारा स्वर प्राप्त यही निम्नवर्गीय समाज प्रबुद्धजनों द्वारा अब जातियों में विभक्त किए जाने लगे और अब ललुआ का कद निम्नवर्ग के मसिहा से बदलकर सिर्फ यादव के नेता का कर दिया गया।
यानि कि लालू यादव के पतन की पटकथा तैयार ।
जंगल राज के बाद सुशासन की बारी आई , यहां प्रबुद्धजनों की चलती रही क्योंकि तब-तक सुशासन कुमार को यह पता चल चुका था कि प्रबुद्धजनों को साथ लेकर चलने से ही हमारा भला होता रहेगा और प्रबुद्धजनों ने भी यह भांप लिया था कि लालू प्रसाद यादव के काट के रुप में बिहार में एक निम्नवर्गीय हथियार ही काम आयेगी । अत: गणित जम गई ...
प्रबुद्धजन+सुशासन कुमार=बिहार सरकार।धीरे-धीरे "सत्ता का ताप" सुशासन कुमार पर हावि होने लगा और प्रबुद्धजनों को यह नागवार गुजरा। सुशासन कुमार अब खुद को असहाय महसूस करने लगे और यहीं एक बहुत बड़ा गलती कर बैठे , लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाकर । बिहार को एक विकल्प दे डाला , तेजस्वी के रुप में।
कहानी कुछ ऐसे जाती है....राजद से हाथ मिलाकर वे जनता द्वारा दूसरे नम्बर पर पहुंचा दिए गए यानि कि कद में ह्रास यानि कि शक्ति में भी अवमूल्यन परन्तु खुद को हावि रखने के लिए इन्होंने पुन:अपना मुख प्रबुद्धजनों की मोड़ा .... लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। प्रबुद्धजन इनके मजबूरी को समझ चुके थे और इनके मातहत रह भतिजा बिहार के नब्ज पकड़ चुके थे। एक तरफ कांटा और दूसरे तरफ खाई यानि एक निसहाय कुमार का आज बिहार के सत्ता पर प्रादुर्भाव हो चुका है।
इधर जनमसिहा सरलमन पिता के गुण और गुरु चाचा सुशासन कुमार के कुटनीति को खुद में समावेश कर भतिजा ने प्रबुद्धजनों द्वारा उकेरा गया राजद की छवि को बदल एक परिपक्व राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करने की ओर कदम बढ़ा सभी को हैरत में डाल दिया।इस नई सोच का ताजा उदाहरण है मनोज झा जी को राज्यसभा में भेजना और जिज्ञासु का अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के रूप में चयन।राजद को एक सांगठनिक पार्टी के रुप में स्थापित करने की चेष्टा मात्र एक साहसिक कदम है।
अब बात करते हैं विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की.....एक समय ऐसा लग रहा था कि विद्वजनों की फौज कहीं है तो भाजपा में है।संगठन किसी का नाम है तो भाजपा है।पर फिर वही समय चक्र , फिर वही "सत्ता का ताप" ..... प्रबुद्धजनों की भाषा ही बदल गई।आज आप विरोध कर दो....उधर से लच्छेदार गालियों से नवाजे जाओगे। सोशल मिडिया पर भाषा ऐसी की संघ शिक्षा भी शरमा जाए , प्रधानमंत्री महोदय के मुख से भी अपशब्द।"सत्ता का ताप" का कहर ऐसा कि भाषाई मर्यादा भी तार-तार हो रही है,हर एक जिम्मेदार व्यक्ति के बोल से घमण्ड की बू बरबस टपक रहीं है।हद है भाई....क्या सचमुच ऐसा होता है "सत्ता का ताप" ?
कल तक राजद को कोसने वाले आज गुण्डे मावाली को भी प्रत्याशी बनाते नहीं शरमाते।कल तक दूसरे दलों पर परिवारवाद का तोहमत लगाने वाले , आज परिवारवाद को टुकड़ों में बढ़ावा देने की राह पर चल निकले है।
बस इतना ही कहूंगा कि ये जो "सत्ता का ताप" है न भैया... हिटलर को भी डसा , सद्दाम हुसैन को भी नहीं बक्शा , जुल्फीकार अली भुट्टो ,इन्दिरा गांधी ,परवेज मुशर्रफ किसी को नहीं छोड़ा

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