एक तरफ रुपये में जारी लगातार गिरावट परेशानी का सबब बना हुआ है तो दूसरी ओर पेट्रोल और डीजल ने मोदी सरकार के ''नाकों में दम'' कर रखा है. रुपये में कमजोरी से चालू खाते का घाटा बढ़ता जा रहा है. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह घाटा जीडीपी के 2.4 प्रतिशत तक पहुंच गया.
अगर इसपर तत्काल नियंत्रण नहीं किया गया तो चुनावी साल में महंगाई अपने उच्चतम स्तर पर होगी और भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की कगार पर आ जाएगी. इस समस्या से निजात पाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आनन-फानन में बैठक कर कई निर्णय लिए
चालू खाते का घाटा यानी ''कैड'' देश में आने वाली और देश से बाहर जाने वाली कुल विदेशी मुद्रा के अंतर को कहते हैं. जब कम विदेशी मुद्रा आती है और अधिक मुद्रा प्रवाह बहार जाती है तो यह घाटे की स्थिति होती है.चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह घाटा जीडीपी के 2.4 प्रतिशत तक पहुंच गया. व्यापार घाटा बढ़ने और डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट आने से कैड पर दबाव बढ़ रहा है.
अमेरिकी डालर के मुकाबले रुपया 12 सितंबर को रिकार्ड 72.91 तक नीचे गिर गया था. घरेलू मुद्रा अगस्त से लेकर अब तक करीब 6 प्रतिशत टूट गया है. सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के कई देश आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं. अमेरिका ने चीन से ट्रेड -वॉर छेड़ रखी है. अमेरिकी प्रतिबन्ध के कारण ईरान की अर्थव्यस्था में भी उथल-पुथल जारी है.
भारत एक आयातक देश है, हमारे देश को दूसरे देशों से तेल और अन्य सामान खरीदने के लिए अधिकांशतः यूएस डॉलर में भुगतान करना होता है. भारत को अन्य देशों से महंगा तेल आयात करना पड़ेगा और उन्हें डॉलर में ही भुगतान करना होगा जिससे रुपया और टूट जाएगी. देश में महंगाई उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएगी और भारत आर्थिक मंदी के चपेट में भी आ सकता है.
बता दें कि ईरान तेल के लिए भारतीय करेंसी रुपया में भुगतान लेता है जबकि अन्य देश को डॉलर में पेमेंट करना पड़ता है. डॉलर में तुर्की में अमेरिका की नीतियों की वजह से आर्थिक संकट जारी है


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